हरिवंश महाप्रभु 31वर्ष तक देववनमें रहे.अपनी आयु के 32वेंवर्ष में उन्होंने दैवीय प्रेरणा से वृंदावन के लिए प्रस्थान किया.मार्ग में उन्हें चिरथावलग्राम में रात्रि विश्राम करना पडा.वहां उन्होंने स्वप्न में प्राप्त राधारानीके आदेशानुसार एक ब्राह्मण की दो पुत्रियों के साथ विधिवत विवाह किया.बाद में उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों और कन्यादान में प्राप्त “श्री राधा वल्लभ लाल” के विग्रह को लेकर वृंदावन प्रस्थान किया.SeeMore......
Thursday, 23 February 2012
Wednesday, 1 February 2012
वृंदावन के वृक्ष को मर्म न जाने कोय
कहते है कि जो वृदांवन में शरीर को त्यागता है. तो उन्हें अगला जन्म श्री वृदांवन में ही होता है. और अगर कोई मन में ये सोच ले, संकल्प कर ले कि हम वृदावंन जाएगे, और यदि रास्ते में ही मर जाए तो भी उसका अगला जन्म वृदांवन में ही होगा. केवल संकल्प मात्र से उसका जन्म श्री धाम में होता है.
ऐसा ही एक प्रसंग श्री धाम वृन्दावन है, तीन मित्र थे जो युवावस्था में थे तीनों बंग देश के थे. तीनों में बडी गहरी मित्रता थी, तीनो में से एक बहुत सम्पन्न परिवार का था पर उसका मन श्रीधाम वृदांवन में अटका था.....
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Monday, 23 January 2012
ब्रज उत्सव में पढ़े "ठाकुर जी का हिंडोलना उत्सव"
सावन के आते ही ब्रज के कई मन्दिरों में हिंडोला एवं घटा उत्सव की धूम शुरू हो जाती है. वृन्दावन एवं बरसाना का मशहूर हिंडोला उत्सव "हरियाली तीज" के दिन से लेकर "राखी पूर्णिमा" तक श्री जी नित्य झूला में बैठकर, सुन्दर-सुन्दर हिंडोरन में विराजमान होकर हम सभी रसिक भक्तों के नैन रुपी चातक को अपने अलौकिक दर्शन की दिव्य वर्षा के द्वारा संतृप्त करते है.
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Thursday, 19 January 2012
"मईया दाऊ बहुत खिजायो"
एक बार बालक श्रीकृष्ण अपनें सखाओं संग खेल रहे थे. श्रीदामा, बलराम तथा मनसुखा आदि उनके साथ रसमयी क्रीड़ा का आनन्द ले रहे थे. इस खेल में एक बालक दूसरे के हाथ में ताली मारकर भागता और दूसरा उसे पकड़ने का प्रयास करता था. बलदाऊ को लगा कही कान्हा को चोट न लग जाये. इसीलिए उन्होनें कान्हा को समझाया- मोहन तुम मत भागो. अभी तुम छोटे हो, तुम्हारे पैरों में चोट लग जायेगी.
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Wednesday, 18 January 2012
राधारानी जी की छठी सखी - श्री रंगदेवी जी"
श्री राधाकुंड के दक्षिण–पश्चिम कोणवर्ती दल पर श्यामवर्ण की "सुखदा –नामक कुंज" है जिसमे श्री कृष्ण वल्लभा श्री रंग देवी जी नित्य निवास करती है .इनकी कमल केसर वर्ण सदृश अंग कांति है और जावा पुष्प कांति के वस्त्र धारण करती है श्री कृष्ण में उत्कंठिता –नायिका भावानात्मका रति है.
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